पालन हार एक - Moral Story

पालन हार एक  ( Moral Story)

किसी नगर में एक सेठ जी रहते थे। उनके घर के नजदीक ही एक संत महात्मा रहता था।एक रात्रि को संत महात्मा के सत्संग भजन की ध्वनि के कारण उन्हें ठीक से नींद नहीं आयी।
सुबह उन्होंने संत जी को खूब डाँटा कि:- यह सब क्या है ?

संत जी बोले:-परमपिता परमात्मा का सत्संग भजन कीर्तन चल रहा था।
सेठजी बोले:- सत्संग भजन करते हो, तो क्या हमारी नींद हराम करोगे ?अच्छी नींद के बाद ही व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है फिर कमाता है, तब खाता है।
*इसके बाद संत और सेठ के बीच हुआ संवाद.......*

संत:- *"सेठजी ! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है।"*

सेठजी:- *"कौन खिलाता है ? क्या तुम्हारा भगवान खिलाने आयेगा?"*

संत:- "वही तो खिलाता है।"

सेठजी:- *"क्या भगवान खिलाता है, हम कमाते हैं तब खाते हैं।"*

संत:- *"निमित्त होता है तुम्हारा कमाना,और पत्नी का रोटी बनाना, बाकी सब को खिलाने वाला,सब का पालनहार तो वह परमात्मा ही है।"*
सेठजी:- "क्या पालनहार - पालनहार लगा रखा है !
बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो।क्या तुम्हारा पालने वाला एक - एक को आकर खिलाता है? हम कमाते हैं तभी तो खाते हैं।

संत:- *"सभी को वही खिलाता है।"*

सेठजी:- "हम नहीं खाते उसका दिया।"

संत:- *"नहीं खाओ तो मारकर भी खिलाता है।"*.

सेठ ने कहा:- *"संत जी ! अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटों में नहीं खिला पाया तो फिर तुम्हें अपना यह भजन-सत्संग सदा के लिए बंद करना होगा।"*

संत:- "मैं जानता हूँ कि तुम्हारी पहुँच बहुत ऊपर तक है, लेकिन उसके हाथ बड़े लम्बे हैं।जब तक वह नहीं चाहता, तब तक किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता आजमा कर देख लेना।

संत की निष्ठा परखने के लिये सेठ जी घोर जंगल में चले गये और एक विशालकाय वृक्ष की ऊँची डाल पर ये सोचकर बैठ गये कि अब देखें इधर कौन खिलाने आता है ?
चौबीस घंटे बीत जायेंगे और संत की हार हो जायेगी। सदा के लिए सत्संग की झंझट मिट जायेगी।

तभी एक अजनबी आदमी वहाँ आया।उसने उसी वृक्ष के नीचे आराम किया,फिर अपना सामान उठाकर चल दिया, लेकिन अपना एक थैला वहीं भूल गया।
*भूल गया कहो या छोड़ गया कहो*

*भगवान ने किसी मनुष्य को प्रेरणा दी थी अथवा मनुष्य के रूप में साक्षात् भगवान ही वहाँ आये थे यह तो भगवान ही जानें !*
थोड़ी देर बाद पाँच डकैत वहाँ पहुँचे उनमें से एक ने अपने सरदार से कहा, "उस्ताद ! यहाँ कोई थैला पड़ा है।"

क्या है ? जरा देखो ! खोल कर देखा, तो उसमें गरमा - गरम भोजन से भरा टिफिन!

उस्ताद भूख लगी है. लगता है यह भोजन भगवान ने हमारे लिए ही भेजा है।
अरे ! तेरा भगवान यहाँ कैसे भोजन भेजेगा ? हम को पकड़ने या फँसाने के लिए किसी शत्रु ने ही जहर-वहर डालकर यह टिफिन यहाँ रखा होगा,अथवा पुलिस का कोई षडयंत्र होगा। इधर उधर देखो जरा,कौन रखकर गया है।

उन्होंने इधर-उधर देखा,लेकिन कोई भी आदमी नहीं दिखा। तब डाकुओं के मुखिया ने जोर से आवाज लगायी,कोई हो तो बताये कि यह थैला यहाँ कौन छोड़ गया है ?
सेठजी ऊपर बैठे - बैठे सोचने लगे कि अगर मैं कुछ बोलूँगा तो ये मेरे ही गले पड़ेंगे।
वे तो चुप रहे,लेकिन
*जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है,भक्तवत्सल है, वह अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शाँत नहीं रहता.*

उसने उन डकैतों को प्रेरित किया और उनके मन में प्रेरणा जागी कि ..'ऊपर भी देखो.' उन्होंने ऊपर देखा तो वृक्ष की डाल पर एक आदमी बैठा हुआ दिखा।डकैत चिल्लाये, अरे ! नीचे उतर!
सेठजी बोले, मैं नहीं उतरता.
क्यों नहीं उतरता, यह भोजन तूने ही रखा होगा।

सेठजी बोले, मैंने नहीं रखा।कोई यात्री अभी यहाँ आया था,वही इसे यहाँ भूलकर चला गया.
नीचे उतर!तूने ही रखा होगा जहर मिलाकर,और अब बचने के लिए बहाने बना रहा है।
तुझे ही यह भोजन खाना पड़ेगा.
*अब कौन-सा काम वह सर्वेश्वर किसके द्वारा,किस निमित्त से करवाये अथवा उसके लिए क्या रूप ले,यह उसकी मर्जी की बात है.बड़ी गजब की व्यवस्था है उस परमेश्वर की.*
सेठजी बोले:- *"मैं नीचे नहीं उतरूँगा और खाना तो मैं कतई नहीं खाऊँगा"।*

पक्का तूने खाने में जहर मिलाया है. अरे ! नीचे उतर अब तो तुझे खाना ही होगा।

सेठजी बोले:- *"मैं नहीं खाऊँगा, नीचे भी नहीं उतरूँगा।"*
अरे कैसे नहीं उतरेगा.
सरदार ने एक आदमी को हुक्म दिया इसको जबरदस्ती नीचे उतारो।डकैत ने सेठ को पकड़कर नीचे उतारा।

*ले खाना खा!*

सेठ जी बोले:- *"मैं नहीं खाऊँगा।*
उस्ताद ने धड़ाक से उनके मुँह पर तमाचा जड़ दिया।
सेठ को संत जी की बात याद आयी कि:- *"नहीं खाओगे तो, मारकर भी खिलायेगा"।*
सेठ फिर बोला:- *"मैं नहीं खाऊँगा।"*
अरे कैसे नहीं खायेगा ! इसकी नाक दबाओ और मुँह खोलो.

डकैतों ने सेठ की नाक दबायी, मुँह खुलवाया और जबरदस्ती खिलाने लगे।वे नहीं खा रहे थे, तो डकैत उन्हें पीटने लगे।

तब सेठ जी ने सोचा कि ये पाँच हैं और मैं अकेला हूँ।
नहीं खाऊँगा तो ये मेरी हड्डी पसली एक कर देंगे।
इसलिए चुपचाप खाने लगे और मन-ही-मन कहा:- *"मान गये मेरे बाप ! मार कर भी खिलाता है!"*
डकैतों के रूप में आकर खिला, चाहे भक्तों के रूप में आकर खिला लेकिन खिलाने वाला तो तू ही है।अपने संत की बात सत्य साबित कर दिखायी।
सेठजी के मन में भक्ति की धारा फूट पड़ी।

उनको मार-पीट कर ...डकैत वहाँ से चले गये, तो सेठजी भागे और संत जी के पास आकर बोले:- *"संत जी ! मान गये आपकी बात कि नहीं खायें तो वह मार कर भी खिलाता है।"*

*संसार जगत में निमित्त तो कोई भी हो सकता है किन्तु सत्य यही है कि ईश्वर ही जगत की व्यवस्था का कुशल संचालन करते हैं।अतः अपने जगत के आधार ईश्वर पर विश्वास ही नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास होना चाहिए ।*

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